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SHRI RAM AUR KEVAT PRASANG

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रात्रि में श्रीराम, सीता वृक्ष के नीचे घासफूस के बिछौने पर रात्रि विश्राम करते हैं और लक्ष्मण माता सुमित्रा के आदेश का पालन करते हुए रात्रि पहरा देते हैं। सुबह होने पर श्रीराम निषादराज से नदी पार करने के लिए नौका का प्रबंध करने का अनुरोध करते है तथा आर्य सुमन्त से वापस अयोध्या जाने, पिता दशरथ को सम्हालने और भरत के राज्याभिषेक की व्यवस्था करने का निवेदन करते हैं। सुमन्त राजा दशरथ की इच्छानुसार सीता को वापस अयोध्या भेजने का अनुरोध राम से करते हैं, लेकिन स्वयं सीता पत्नी धर्म निभाते हुए मना कर देती हैं। केवट नौका लेकर आता है, लेकिन श्रीराम को देख कर वह उन्हें अपनी नौका में बिठाने से मना कर देता है, क्योंकि वह श्रीराम के चरणों की महिमा से भली-भांति परिचित था, कि एक शिला उनके चरण स्पर्श से सुंदर नारी बन गई थी। वह वास्तव में श्री राम की महिमा को जान चुका था और बहाने से उनका चरणामृत पीना चाहता है। वह श्री राम के चरणों को धोकर उस जल का पान करता है। केवट सभी को अपनी नौका में बिठा कर नदी पार करा देता है। सीता श्री राम को उतराई के बदले में देने के लिए अपनी अंगूठी देती है, जिसे केवट यह कह कर ठुकरा देता है कि श्री राम भी एक केवट हैं, जो सबके भवसागर से पार लगाते है, तो वह उनसे उतराई कैसे ले सकता है। केवट प्रभु राम के चरणों में गिर कर कहता है कि एक दिन वो उनके घाट पर आयेगा तब वे उसे भवसागर पार करा दें, यही उसकी उतराई होगी। श्री राम, लक्ष्मण, सीता और निषादराज तीर्थराज प्रयाग में भारद्वाज मुनि के आश्रम पहुँचते हैं। श्री राम के वनवास से व्यथित भारद्वाज मुनि श्री राम को अपने आश्रम रहने का आमंत्रण देते हैं। लेकिन श्री राम जानते हैं कि अयोध्या प्रयागराज के समीप है, इसलिए अयोध्यावासी कभी भी वहाँ आ सकते हैं। वह भारद्वाज मुनि से कोई अन्य एकांत स्थान पूछते हैं। मुनिवर उन्हें चित्रकूट जाने का परामर्श देते हैं। चित्रकूट एक अत्यन्त पावन स्थान है जहाँ यमुना पार करके जाना है और कोई नाव भी नहीं है। निषादराज और लक्ष्मण मिलकर बाँसों का एक बेड़ा तैयार करते हैं। श्री राम यहाँ से भरत के समान प्रिय अपने मित्र निषादराज को वापस भेज देते हैं, जिसे भारी मन से निषादराज स्वीकार करते हैं। लक्ष्मण बेड़े को यमुना पार ले जाने के लिये खेते हैं।

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