RAJA DASHRATH KA PUTR VIYOG
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महर्षि भारद्वाज के सुझाव पर यमुना पार चित्रकूट जाने के लिए बाँसों से बने एक बेड़े लक्ष्मण स्वयं चलाते है। वही निषादराज राम को विदा कर जब अपने गृह शृंगवेरपुर लौटते हैं, तो उन्हें आर्य सुमन्त राम की प्रतीक्षा करते हुए मिलते हैं, जो दशरथ के आदेश पर राम को वन से वापस लाने के लिए आए थे। निषादराज उन्हें बताते है कि राम का स्पष्ट आदेश है कि वह वापस लौट जाएं। उधर जहाँ एक ओर अयोध्या में पुत्र वियोग में व्याकुल राजा दशरथ राम के लौट आने की आशा जीवित है। वही दूसरी ओर उनकी इस आशा से अनभिज्ञ राम, सीता और लक्ष्मण नंगे पाँव जंगल के पथरीले मार्ग पर आगे बढ़ते जा रहे हैं। ननिहाल में भरत को अशुभ स्वप्न आने पर अनुभव करते हैं कि अयोध्या में कुछ अनहोनी घट चुकी है। वन के मार्ग में राम को भील और कोलों की बस्ती मिलती है। वहां के निवासी राम को आदरपूर्वक चित्रकूट स्थित महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में ले जाते हैं। महर्षि वाल्मीकि जानते हैं कि राम कोई साधारण मानव नहीं, बल्कि साक्षात ईश्वर के अवतार हैं। वे राम से कहते हैं कि वे जिनकी कथा लिख रहे हैं, उसके नायक वही हैं। वे राम को मंदाकिनी नदी के किनारे एक कुटिया बनाकर निवास करने का परामर्श देते हैं। वनवास के नए जीवन की शुरुआत होती है। स्थानीय जन और संत मिलकर पर्णकुटी का निर्माण करते हैं। राजमहल की सुख-सुविधा में पले राम, अब वन की झोपड़ी में रहने को तत्पर हैं। राम पूजा स्थल पर अयोध्या की मिट्टी स्थापित करते हैं और उसे प्रणाम करते हैं जो उनके अयोध्या से अटूट जुड़ाव का प्रतीक है। इधर, मंत्री सुमन्त, राजमहल लौटने से पहले महर्षि वशिष्ठ के पास जाते हैं और उनसे निवेदन करते हैं कि वे राजमहल साथ चलें क्योंकि राजा दशरथ ने उनसे कहा था कि राम न आए तो सीता को तो लेकर अवश्य आना। इसलिए उन्हें विश्वास था कि यदि वशिष्ठ साथ होंगे, तो वे अपने ज्ञान और वचनों से राजा को सांत्वना देंगे। अंततः जब सुमन्त राम और सीता के बिना लौटते हैं, तो दशरथ की व्याकुलता बढ़ जाती है, वे टूट जाते हैं। महर्षि वशिष्ठ उन्हें धर्म और नीति का उपदेश देते हैं - यह जीवन, प्रारब्ध और त्याग की परीक्षा है। यह प्रसंग दर्शाता है कि धर्म का पालन करने वालों के लिये मार्ग कठिन अवश्य होता है, परंतु वह इतिहास और लोक-मानस में अमर हो जाता है।