• स्थितप्रज्ञ ( अपने आप से अपने आप में ही संतुष्ट )
    Feb 20 2026

    * भगवत गीता 2 अध्याय का 55 वा श्लोक

    * जितनी अधिक इच्छाएं उतनी ही अधिक अशांति

    * सार यह निकला मिले हुए कार्य को भगवान का स्मरण करते हुए निष्ठा पूर्वक चेष्टा करते रहें

    * जो कुछ अपने से ठीक बन जाए वह माने भगवान की कृपा से ठीक हुआ है और गलत हो जाए तो अपनी कमी से गलत हुआ

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  • "विवेक"
    Feb 19 2026

    * अंतरात्मा की आवाज विवेक के रूप में प्रकट होती है


    * अच्छाई का अभिमान सारी बुराइयों की जड़ है


    * दो बातों पर पूरा जीवन मिला हुआ प्रारंभ और उस पारीस्थिति का सदुपयोग या दुरुपयोग


    * ज्यादा गड़बड़ तब होती है जब बुराई अच्छाई का चोला पहनके आती है

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  • Bhagwat Gita Hridaya Nyas l Karn Nyas
    Feb 19 2026

    Before Gita ji Paath

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  • Prayer by Gurudev Shri Ojaswi Sharma ji
    Feb 19 2026

    daily prayer 🙏

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  • 'गीता' सभी के लिए
    Feb 19 2026

    * श्रीमद् भागवत गीता 12 अध्याय का 12वां श्लोक , 18 अध्याय का 61- 65 वा श्लोक

    * भगवत गीता सभी के कल्याण के लिए है किसी भी धर्म किसी भी संप्रदाय किसी भी जाति के व्यक्ति के लिए

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    25 mins
  • "भगवान का हर समय स्मरण"
    Feb 18 2026

    * याद रखना दो प्रकार से होता है, एक होती है क्रियात्मक स्मृति और एक होती है ज्ञानात्मक स्मृति

    * हर चीज हर बात यहां पर असीम है अहंकार के कारण सी में दिखती है

    * यह भी गलत धारणा है कि, मैं अभी अशुद्ध हूं मुझे अभी भगवत प्राप्ति होगी नहीं पहले मेरी सारी कमियां दूर हो जाए

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  • "मौत से पहले भगवत प्राप्ति"
    Feb 18 2026

    * चार अवस्थाएं मनुष्य की जाग्रत, स्वप्न, सूशूप्ति और तुरीय

    * जागृत अवस्था में मां के ऊपर बुद्धि का नियंत्रण रहता है, जो स्वप्न में नहीं रहता

    * सूशूप्ति है बिना स्वप्न की नींद

    * मौत शरीर इंद्रियां मन बुद्धि की होती है तुम्हारी नहीं होती

    * तीन प्रकार के शरीर स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीर

    * जिन बातों को हम दुर्भाग्य मानते हैं गहराई में जाकर उनमें भगवान हमारा कुछ संकट काटना चाहते हैं

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    29 mins
  • "हम शरीर नहीं हैं "
    Feb 18 2026

    * स्वामी रामसुखदास जी का लेख पढ़ते हुए

    * जितनी अंदर से आध्यात्मिक उन्नति होगी उतनी ही यह बात समझ में आएगी

    * 5 साल 15 साल 40 साल इस अंतराल में शरीर मन इंद्रियों सब बदल गए परंतु हम अंदर से वही हैं

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